उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा
त्वरित सारांश (TL;DR)
अनुच्छेद 348 (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा): भाग XVII के तहत संघ एवं राज्यों की राजभाषा, न्यायपालिका की भाषा और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों का प्रावधान।
सरल नागरिक भाषा में अर्थ
संविधान के भाग XVII (राजभाषा) का अनुच्छेद 348 'उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा' का उपबंध करता है। यह संघ की राजभाषा (343), राज्यों की अपनी आधिकारिक भाषाओं (345-347), सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट की न्यायिक भाषा (348), किसी भी भाषा में अपनी शिकायत/अभ्यावेदन देने के नागरिक अधिकार (350) और मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा की सुविधा (350A) को संरक्षित करता है।
प्रमुख संवैधानिक उपबंध एवं बिंदु
संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 348): Part XVII के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा' के लिए बाध्यकारी कानूनी नियम तय करता है
इसमें 5 खंड (Clauses) व 5 उप-खंड तथा स्पष्ट संवैधानिक शर्तें (Provisos) दी गई हैं
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्वतंत्र न्यायिक निगरानी द्वारा संरक्षित
अपवाद एवं युक्तियुक्त निर्बंधन (सीमाएं)
अनुच्छेद 350 के तहत कोई भी सरकारी अधिकारी किसी नागरिक की शिकायत को केवल इस आधार पर खारिज नहीं कर सकता कि वह संघ या राज्य में प्रयुक्त किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखी गई है।
दैनिक जीवन में यह क्यों महत्वपूर्ण है?
यह भारत की बहुभाषी संस्कृति का सम्मान करता है और नागरिकों को अपनी भाषा में शासन से संवाद करने का संवैधानिक हक देता है।
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