यदि थाना प्रभारी गंभीर अपराध पर भी एफआईआर दर्ज करने से मना कर दे तो क्या करें?
संगीन अपराध है। एफआईआर न लिखने वाले पुलिस अधिकारी को धारा 166A (BNS 199) के तहत 2 साल तक की जेल हो सकती है।
- • ललिता कुमारी केस में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य किया है।
- • थाना न सुने तो एसपी (SP) को रजिस्टर्ड डाक से शिकायत भेजें या कोर्ट में धारा 156(3) में अर्जी लगाएं।
- अपनी लिखित शिकायत की रिसीविंग लें और न मिलने पर एसपी को रजिस्टर्ड डाक से भेजें।
क्या गिरफ्तारी के समय अरेस्ट मेमो पर किसी परिजन या स्थानीय गवाह के हस्ताक्षर जरूरी हैं?
अनिवार्य है। धारा 41B के तहत अरेस्ट मेमो पर परिवार के कम से कम एक सदस्य या इलाके के प्रतिष्ठित व्यक्ति के हस्ताक्षर होना कानूनी रूप से जरूरी है।
- • अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी का सही समय, तारीख व स्थान लिखा होना चाहिए।
- कहें: 'सर, धारा 41B के तहत कृपया अरेस्ट मेमो बनाइए और गवाह के हस्ताक्षर करवाइए।'
क्या पुलिस हिरासत के दौरान हर 48 घंटे में डॉक्टर से मेडिकल जांच कराना अनिवार्य है?
हाँ, अनिवार्य है। धारा 54 के तहत गिरफ्तारी के समय और हिरासत के दौरान हर 48 घंटे में सरकारी डॉक्टर से मेडिकल जांच कराना पुलिस का कानूनी कर्तव्य है।
- • मेडिकल रिपोर्ट से यह साबित होता है कि पुलिस ने हिरासत में मारपीट की है या नहीं।
- डॉक्टर को सभी चोटें दिखाएं और एमएलसी (MLC) में दर्ज करवाएं।
थाने में 24 घंटे से अधिक समय तक बैठाए रखना: कब हिरासत अवैध कैद बन जाती है?
पूर्णतः गैरकानूनी! संविधान के अनुच्छेद 22(2) और बीएनएसएस की धारा 58 के तहत, पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर नजदीकी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है। 24 घंटे से अधिक थाने में रखना अवैध कैद है।
- • 1. 24 घंटे का समय उसी क्षण से शुरू हो जाता है जब व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लेती है, औपचारिक गिरफ्तारी के समय से नहीं।
- • 2. मजिस्ट्रेट के न्यायिक आदेश के बिना 24 घंटे से अधिक थाने में बैठाना संविधान के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।
- • 3. परिजन तुरंत उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर कर सकते हैं।
- 1. थाने की जनरल डायरी (GD) में आने का सही समय दर्ज करने की मांग करें।
- 2. परिजनों से कहें कि वे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) को अवैध हिरासत की सूचना तुरंत ईमेल या स्पीड पोस्ट से भेजें।
- 3. वकील के माध्यम से उच्च न्यायालय में तत्काल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Article 226) दायर कराएं।
- 4. थाना प्रभारी के खिलाफ राज्य मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराएं।
पुलिस द्वारा घर की तलाशी: क्या पुरुष पुलिसकर्मी महिलाओं के निजी कमरों में बिना महिला पुलिस के घुस सकते हैं?
नहीं! बीएनएसएस की धारा 103 के तहत, महिलाओं के निवास वाले कमरे की तलाशी के समय उन्हें हटने का अवसर देना होगा और तलाशी केवल महिला पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में शालीनता के साथ ही ली जा सकती है।
- • 1. पुरुष पुलिसकर्मी बिना महिला पुलिस के महिलाओं के शयनकक्ष या निजी स्थान में जबरन नहीं घुस सकते।
- • 2. अंदर जाने से पहले महिलाओं को पर्दा करने और कमरे से हटने का उचित समय देना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
- • 3. किसी भी महिला की शारीरिक तलाशी केवल और केवल महिला पुलिसकर्मी द्वारा ही ली जा सकती है।
- 1. बंद दरवाजे से पूछें: "अपना सर्च वारंट दिखाएं और बताएं कि क्या आपके साथ महिला पुलिसकर्मी हैं?\"
- 2. स्पष्ट कहें: "बीएनएसएस की धारा 103 के अनुसार महिला पुलिस के बिना आप महिलाओं के कमरे में नहीं आ सकते।\"
- 3. पड़ोस के दो सम्मानित नागरिकों को गवाह (पंच) के रूप में तुरंत बुलाएं।
- 4. जबरदस्ती घुसने पर 112 पर कॉल करें और मर्यादा हनन की आपराधिक शिकायत दर्ज कराएं।
तलाशी में पुलिस ने फोन, लैपटॉप या नकदी जब्त की: क्या मौके पर ही जब्ती सूची (पंचनामा) देना अनिवार्य है?
अनिवार्य है! बीएनएसएस की धारा 105 के तहत, फोन, लैपटॉप या नकदी जब्त करने पर पुलिस को दो स्थानीय गवाहों के हस्ताक्षर के साथ मौके पर ही जब्ती सूची (पंचनामा) बनाकर उसकी एक मुफ्त प्रति तुरंत देनी होगी।
- • 1. पुलिस बिना मौके पर लिखित जब्ती सूची बनाए कोई भी फोन, नकदी या सामान अनौपचारिक रूप से नहीं ले जा सकती।
- • 2. पंचनामे में सामान का सीरियल नंबर, आईएमईआई (IMEI) और उसकी सही स्थिति का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
- • 3. मोबाइल या लैपटॉप के मामले में पुलिस को डिजिटल हैश वैल्यू (Hash Value) दर्ज करना जरूरी है ताकि सबूतों से छेड़छाड़ न हो।
- 1. पुलिस अधिकारी से कहें: "बीएनएसएस की धारा 105 के तहत सामान ले जाने से पहले जब्ती सूची (पंचनामा) तैयार करें।\"
- 2. पड़ोस के दो गवाहों के हस्ताक्षर उस सूची पर करवाएं।
- 3. जांच अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित सूची की एक प्रति तुरंत अपने पास रखें।
- 4. बिना रसीद सामान ले जाने पर तुरंत जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) और मजिस्ट्रेट को लिखित शिकायत भेजें।
थाने में पुलिस द्वारा मारपीट या दुर्व्यवहार: क्या आप सबूत के लिए सीसीटीवी फुटेज मांग सकते हैं?
हाँ! सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय (परमवीर सिंह सैनी 2020) के अनुसार देश के सभी थानों के लॉकअप, कॉरिडोर और कमरों में ऑडियो और नाइट विजन युक्त सीसीटीवी कैमरे लगाना और 18 महीने तक फुटेज सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
- • 1. थाने के मुख्य द्वार, हवालात, गलियारे और जांच अधिकारी के कमरे में ऑडियो युक्त सीसीटीवी होना जरूरी है।
- • 2. फुटेज को कम से कम 18 महीने तक सुरक्षित रखना राज्य सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी है।
- • 3. यदि मारपीट के समय पुलिस कहे कि "कैमरा खराब था", तो अदालत पुलिस के खिलाफ प्रतिकूल कानूनी निष्कर्ष निकालती है।
- 1. थाने का सही समय, तारीख और उस कमरे का विवरण नोट करें जहां घटना घटी।
- 2. पुलिस अधीक्षक (SP) और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को पत्र भेजें: "सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार थाने का सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित किया जाए।\"
- 3. राज्य मानवाधिकार आयोग और पुलिस शिकायत प्राधिकरण में अर्जी दें।
- 4. उच्च न्यायालय में याचिका लगाकर डीवीआर (DVR) जब्त करने का अदालती आदेश प्राप्त करें।
पुलिस द्वारा गिरफ्तारी: क्या पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह तुरंत आपके परिवार या वकील को सूचित करे?
बाध्यकारी है! बीएनएसएस की धारा 48 और डी.के. बसु गाइडलाइंस के तहत, गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी को तुरंत गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा बताए गए रिश्तेदार, मित्र या वकील को गिरफ्तारी और थाने की सूचना देना अनिवार्य है।
- • 1. गिरफ्तारी के समय पुलिस अधिकारी के पास उसकी वर्दी पर नाम और पद का स्पष्ट बैच होना चाहिए।
- • 2. यदि परिजन दूसरे शहर में रहते हैं, तो 8 से 12 घंटे के भीतर टेलीफोन या वायरलेस द्वारा सूचना देना अनिवार्य है।
- • 3. थाने की डायरी में उस रिश्तेदार का नाम और सूचना देने का समय दर्ज करना वैधानिक रूप से जरूरी है।
- 1. पुलिस अधिकारी से कहें: "बीएनएसएस धारा 48 के तहत मेरे इस परिजन [नाम व फोन] को तुरंत फोन कर सूचना दें।\"
- 2. वकील के आने तक कोई भी बयान देने से शांत रहें।
- 3. अरेस्ट मेमो में परिजन को सूचना देने का समय और हस्ताक्षर जरूर देखें।
- 4. मजिस्ट्रेट के सामने पहली पेशी पर बताएं कि पुलिस ने गुप्त रूप से रखा और धारा 48 का उल्लंघन किया।