किन्नर/ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार: क्या नौकरी, शिक्षा या मकान किराए पर देने में भेदभाव किया जा सकता है?
पूर्णतः प्रतिबंधित! ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 और नालसा (NALSA) निर्णय के अनुसार, नौकरी, मकान किराए पर देने या सार्वजनिक स्थानों पर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ भेदभाव करना कानूनन दंडनीय अपराध है।
- • 1. कोई भी सरकारी या निजी संस्थान लैंगिक पहचान के आधार पर नौकरी या पदोन्नति से मना नहीं कर सकता।
- • 2. प्रत्येक कंपनी में समान अवसर नीति (Equal Opportunity Policy) और शिकायत अधिकारी होना अनिवार्य है।
- • 3. ट्रांसजेंडर व्यक्ति को मकान खाली करने के लिए मजबूर करना धारा 18 के तहत 2 साल तक की जेल वाला अपराध है।
- 1. राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर पोर्टल (transgender.dosje.gov.in) से अपना आधिकारिक पहचान प्रमाण पत्र प्राप्त करें।
- 2. नौकरी या किराए में भेदभाव होने पर संस्थान के शिकायत अधिकारी को लिखित शिकायत दें।
- 3. जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास धारा 18 के तहत कार्रवाई के लिए शिकायत दर्ज कराएं।
- 4. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करें।
क्या धारा 144 में सरकार मनमाने ढंग से मोबाइल इंटरनेट बंद कर सकती है?
बिल्कुल नहीं! सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक अनुराधा भसीन (2020) फैसले के अनुसार इंटरनेट का उपयोग अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति) व 19(1)(g) (व्यापार) के तहत मौलिक अधिकार है। मनमाना या अनिश्चितकालीन इंटरनेट बैन असंवैधानिक है।
- • 1. इंटरनेट का मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने अनुराधा भसीन (2020) में स्पष्ट किया कि इंटरनेट के माध्यम से विचार व्यक्त करना और व्यवसाय चलाना अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(g) के तहत मौलिक अधिकार है।
- • 2. अनुपातिकता का परीक्षण: प्रशासन सामान्य कानून-व्यवस्था या परीक्षा में नकल रोकने के लिए पूरी जनता का इंटरनेट बंद नहीं कर सकता। यह केवल अपरिहार्य सार्वजनिक आपातकाल में ही अंतिम उपाय के रूप में संभव है।
- • 3. आदेश सार्वजनिक करना अनिवार्य: इंटरनेट प्रतिबंध का लिखित आदेश जनता के लिए प्रकाशित करना कानूनी रूप से अनिवार्य है ताकि प्रभावित नागरिक हाई कोर्ट में रिट दायर कर सकें।
- • 4. अधिकतम 15 दिन की सीमा: 2020 के संशोधित नियमों के तहत कोई भी इंटरनेट शटडाउन एक बार में 15 दिन से अधिक लागू नहीं रह सकता और 5 कार्यदिवसों में विधिक समीक्षा समिति द्वारा समीक्षा आवश्यक है।
- 1. सक्षम गृह सचिव द्वारा जारी विधिक लिखित आदेश की प्रति मांगें व जांचें कि क्या उसमें आवश्यक आपातकालीन कारण दर्ज हैं।
- 2. जरूरी सेवाओं जैसे यूपीआई, चिकित्सा, ऑनलाइन पढ़ाई या आजीविका में आई रुकावटों के साक्ष्य एकत्रित करें।
- 3. मनमाने इंटरनेट बैन के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में तुरंत रिट याचिका दायर करें।