संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 110 'धन विधेयक (Money Bill) की परिभाषा' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 111 'विधेयकों पर अनुमति (राष्ट्रपति की स्वीकृति)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 112 'वार्षिक वित्तीय विवरण (केंद्रीय बजट)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 113 'संसद में प्राक्कलनों (Estimates) के संबंध में प्रक्रिया' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 114 'विनियोग विधेयक (Appropriation Bills)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 115 'अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 116 'लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 117 'वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 118 'प्रक्रिया के नियम' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 119 'संसद में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 120 'संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 121 'संसद में चर्चा पर निर्बंधन (न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 122 'न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के Part V में स्थित अनुच्छेद 123 'संसद के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति' के संबंध में स्पष्ट संवैधानिक नियम और प्रक्रियात्मक सीमाएं निर्धारित करता है।
अनुच्छेद 124 देश के सबसे बड़े न्यायालय—सुप्रीम कोर्ट—की स्थापना करता है। यह न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव से पूरी तरह स्वतंत्र रखता है। किसी भी जज को सरकार अपनी मर्जी से नहीं हटा सकती; उन्हें केवल संसद में महाभियोग (दो-तिहाई बहुमत) द्वारा ही साबित कदाचार पर हटाया जा सकता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 125 'न्यायाधीशों के वेतन आदि' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 126 'कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 127 'तदर्थ (Ad hoc) न्यायाधीशों की नियुक्ति' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 128 'उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 129 'उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होना' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 130 'उच्चतम न्यायालय का स्थान' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 131 'उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता (केंद्र-राज्य विवाद)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 132 'कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 133 'सिविल विषयों से संबंधित उच्च न्यायालयों से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 134 'दांडिक (आपराधिक) विषयों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 134A 'उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाणपत्र' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 135 'विद्यमान विधि के अधीन फेडरल न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियों का उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य होना' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 136 'अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत (Special Leave Petition - SLP)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 137 'उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णयों या आदेशों का पुनर्विलोकन (Review)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 138 'उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वृद्धि' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।