संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 52 'भारत के राष्ट्रपति' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 53 'संघ की कार्यपालिका शक्ति' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 54 'राष्ट्रपति का निर्वाचन' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 55 'राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 56 'राष्ट्रपति की पदावधि' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 57 'पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 58 'राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं (योग्यताएं)' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 59 'राष्ट्रपति के पद के लिए शर्तें' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 60 'राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 61 'राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 62 'राष्ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रिक्ति को भरने वाले व्यक्ति की पदावधि' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 63 'भारत का उपराष्ट्रपति' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 64 'उपराष्ट्रपति का राज्य सभा का पदेन सभापति होना' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 65 'राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या उनकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 66 'उपराष्ट्रपति का निर्वाचन' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 67 'उपराष्ट्रपति की पदावधि' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 68 'उपराष्ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रिक्ति को भरने वाले व्यक्ति की पदावधि' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 69 'उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 70 'अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 71 'राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित या संसक्त विषय' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति मृत्युदंड या अन्य गंभीर सजा पाए दोषियों की दया याचिका (Mercy Petition) पर फैसला लेते हैं। यह शक्ति राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर इस्तेमाल करते हैं। यह कोई साधारण अपील नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली में दया और त्रुटि-सुधार का सर्वोच्च संवैधानिक तंत्र है।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 73 'संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 74 'राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 75 'मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध (प्रधानमंत्री की नियुक्ति और सामूहिक उत्तरदायित्व)' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 76 'भारत का महान्यायवादी (Attorney-General)' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 77 'भारत सरकार के कार्य का संचालन' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V (संघ की कार्यपालिका) का अनुच्छेद 78 'राष्ट्रपति को जानकारी देने आदि के संबंध में प्रधानमंत्री के कर्तव्य' को निर्धारित करता है। यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्वाचन, पदावधि, शपथ, पात्रता या संवैधानिक कर्तव्यों की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है ताकि संघ सरकार संविधान के दायरे में रहकर कार्य करे।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 79 'संसद का गठन' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 80 'राज्य सभा की संरचना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 81 'लोक सभा की संरचना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 82 'प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनः समायोजन (परिसीमन)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 83 'संसद के सदनों की अवधि' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 84 'संसद की सदस्यता के लिए अर्हता (योग्यता)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 85 'संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 86 'सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राष्ट्रपति का अधिकार' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 87 'राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 88 'सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 89 'राज्य सभा का सभापति और उपसभापति' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 90 'उपसभापति का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 91 'सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 92 'जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 93 'लोक सभा का अध्यक्ष (Speaker) और उपाध्यक्ष (Deputy Speaker)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 94 'अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 95 'अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 96 'जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 97 'सभापति और उपसभापति तथा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 98 'संसद का सचिवालय' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 99 'सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 100 'सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति (Quorum)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 101 'स्थानों का रिक्त होना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 102 'सदस्यता के लिए निरर्हताएं (अयोग्यताएं)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 103 'सदस्यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्नों पर विनिश्चय' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 104 'अनुच्छेद 99 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले या अर्हित न होते हुए या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 105 'संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार आदि' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 106 'सदस्यों के वेतन और भत्ते' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 107 'विधेयकों के पुरःस्थापन और पारित किए जाने के संबंध में उपबंध' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 108 'कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 109 'धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 110 'धन विधेयक (Money Bill) की परिभाषा' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 111 'विधेयकों पर अनुमति (राष्ट्रपति की स्वीकृति)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 112 'वार्षिक वित्तीय विवरण (केंद्रीय बजट)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 113 'संसद में प्राक्कलनों (Estimates) के संबंध में प्रक्रिया' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 114 'विनियोग विधेयक (Appropriation Bills)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 115 'अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 116 'लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 117 'वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 118 'प्रक्रिया के नियम' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 119 'संसद में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 120 'संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 121 'संसद में चर्चा पर निर्बंधन (न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं)' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय II (संसद) में अनुच्छेद 122 'न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना' का प्रावधान करता है। यह लोकसभा व राज्यसभा के गठन, अध्यक्ष/सभापति की शक्तियों, सांसदों की अर्हता व निरर्हता, कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों को पास करने, बजट अनुदान और संसदीय विशेषाधिकारों की संवैधानिक प्रक्रिया तय करता है।
संविधान के Part V में स्थित अनुच्छेद 123 'संसद के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति' के संबंध में स्पष्ट संवैधानिक नियम और प्रक्रियात्मक सीमाएं निर्धारित करता है।
अनुच्छेद 124 देश के सबसे बड़े न्यायालय—सुप्रीम कोर्ट—की स्थापना करता है। यह न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव से पूरी तरह स्वतंत्र रखता है। किसी भी जज को सरकार अपनी मर्जी से नहीं हटा सकती; उन्हें केवल संसद में महाभियोग (दो-तिहाई बहुमत) द्वारा ही साबित कदाचार पर हटाया जा सकता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 125 'न्यायाधीशों के वेतन आदि' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 126 'कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 127 'तदर्थ (Ad hoc) न्यायाधीशों की नियुक्ति' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 128 'उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 129 'उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होना' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 130 'उच्चतम न्यायालय का स्थान' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 131 'उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता (केंद्र-राज्य विवाद)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 132 'कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 133 'सिविल विषयों से संबंधित उच्च न्यायालयों से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 134 'दांडिक (आपराधिक) विषयों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 134A 'उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाणपत्र' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 135 'विद्यमान विधि के अधीन फेडरल न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियों का उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य होना' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 136 'अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत (Special Leave Petition - SLP)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 137 'उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णयों या आदेशों का पुनर्विलोकन (Review)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 138 'उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वृद्धि' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 139 'कुछ रिट निकालने की शक्तियों का उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त किया जाना' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 139A 'कुछ मामलों का अंतरण (Transfer of Cases)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 140 'उच्चतम न्यायालय की आनुषंगिक शक्तियां' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
अनुच्छेद 141 घोषणा करता है कि 'उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होगी।' इसी अनुच्छेद की शक्ति से सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले—जैसे डी.के. बसु के गिरफ्तारी नियम, अर्नेश कुमार के जमानत नियम, ललिता कुमारी का अनिवार्य FIR नियम या बुलडोजर कार्रवाई पर रोक—देश के हर थाने, तहसील और निचली अदालत पर कानून की तरह तुरंत लागू होते हैं।
अनुच्छेद 142(1) सुप्रीम कोर्ट को एक असाधारण और अद्वितीय शक्ति देता है: जब किसी मामले में मौजूदा कानून मौन हो या तकनीकी पेचीदगियों के कारण पीड़ित को इंसाफ न मिल पा रहा हो, तब सुप्रीम कोर्ट 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए कोई भी आवश्यक आदेश पारित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करके अनेक ऐतिहासिक काम किए हैं—जैसे कानून बनने से पहले कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए 'विशाखा गाइडलाइंस (1997)' जारी करना, भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को मुआवजा दिलाना, गवाहों की सुरक्षा योजना लागू करना, और आपसी सहमति से तलाक के मामलों में 6 महीने की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को समाप्त कर तुरंत राहत देना (शिल्पा शैलेश केस, 2023)।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 143 'उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति (Presidential Reference)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 144 'सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य किया जाना' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 145 'न्यायालय के नियम आदि' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 146 'उच्चतम न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय IV (संघ की न्यायपालिका) का अनुच्छेद 147 'निर्वचन (व्याख्या)' से संबंधित है। यह सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीशों की सेवा शर्तों, अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की शक्ति, केंद्र-राज्य विवादों की आरंभिक अधिकारिता, दीवानी व फौजदारी अपीलों, निर्णयों के पुनर्विलोकन (Review) तथा न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय V का अनुच्छेद 148 'भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG)' का उपबंध करता है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को संविधान के अधीन सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी बताया था। यह केंद्र और राज्य सरकारों के प्रत्येक रुपये के खर्च की स्वतंत्र जांच और उसकी ऑडिट रिपोर्ट संसद व विधानसभा के पटल पर रखने की अनिवार्यता तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय V का अनुच्छेद 149 'नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्य और शक्तियां' का उपबंध करता है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को संविधान के अधीन सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी बताया था। यह केंद्र और राज्य सरकारों के प्रत्येक रुपये के खर्च की स्वतंत्र जांच और उसकी ऑडिट रिपोर्ट संसद व विधानसभा के पटल पर रखने की अनिवार्यता तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय V का अनुच्छेद 150 'संघ के और राज्यों के लेखाओं का प्ररूप' का उपबंध करता है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को संविधान के अधीन सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी बताया था। यह केंद्र और राज्य सरकारों के प्रत्येक रुपये के खर्च की स्वतंत्र जांच और उसकी ऑडिट रिपोर्ट संसद व विधानसभा के पटल पर रखने की अनिवार्यता तय करता है।
संविधान के भाग V के अध्याय V का अनुच्छेद 151 'संपरीक्षा प्रतिवेदन (Audit Reports)' का उपबंध करता है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को संविधान के अधीन सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी बताया था। यह केंद्र और राज्य सरकारों के प्रत्येक रुपये के खर्च की स्वतंत्र जांच और उसकी ऑडिट रिपोर्ट संसद व विधानसभा के पटल पर रखने की अनिवार्यता तय करता है।