अनुच्छेद 29
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
अनुच्छेद 29 भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का रक्षक है। अनुच्छेद 29(1) के अनुसार, भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का पूर्ण मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 29(2) स्पष्ट करता है कि राज्य द्वारा पोषित या सरकारी सहायता पाने वाले किसी भी स्कूल/कॉलेज में किसी भी नागरिक को धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 30
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
अनुच्छेद 30 धार्मिक अल्पसंख्यकों और भाषाई अल्पसंख्यकों (जैसे महाराष्ट्र में बांग्ला भाषी या दक्षिण भारत में हिंदी भाषी) के शैक्षणिक अधिकारों का सुरक्षा कवच है। अनुच्छेद 30(1) के तहत सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं (स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय) की स्थापना और प्रशासन का अधिकार है। अनुच्छेद 30(2) सरकार को अनुदान (Aid) देने में अल्पसंख्यक संस्थानों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव करने से रोकता है।
अनुच्छेद 31
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
अनुच्छेद 31 (संपत्ति का अनिवार्य अर्जन (44वें संशोधन द्वारा निरसित)) संविधान के Part III में शामिल था, किंतु संसद ने संविधान (Forty-fourth Amendment (1978)) अधिनियम द्वारा इसे निरसित (Omitted/Repealed) कर दिया है। संवैधानिक क्रम और ऐतिहासिक संदर्भ बनाए रखने के लिए मूल संहिता में इसका क्रमांक सुरक्षित रखा गया है।
अनुच्छेद 31A
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 31A 'संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 31B
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 31B 'कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण (नौवीं अनुसूची)' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 31C
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 31C 'कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 31D
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
अनुच्छेद 31D (राष्ट्रविरोधी क्रियाकलापों के संबंध में विधियों की व्यावृत्ति (निरसित)) संविधान के Part III में शामिल था, किंतु संसद ने संविधान (Forty-third Amendment (1977)) अधिनियम द्वारा इसे निरसित (Omitted/Repealed) कर दिया है। संवैधानिक क्रम और ऐतिहासिक संदर्भ बनाए रखने के लिए मूल संहिता में इसका क्रमांक सुरक्षित रखा गया है।
अनुच्छेद 32
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
9 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को 'संविधान की आत्मा और उसका हृदय' घोषित किया था—क्योंकि यदि नागरिकों को अधिकार दिए जाएं पर उनके छिनने पर उन्हें तुरंत लागू कराने का कोई अचूक कानूनी रास्ता न हो, तो वे अधिकार केवल कागज के टुकड़े रह जाते हैं।
अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 32(1) प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) जाने की गारंटी देता है। अनुच्छेद 32(2) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 5 ऐतिहासिक रिट जारी करने की असीम शक्ति प्राप्त है: (1) बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus - अवैध हिरासत से तत्काल रिहाई), (2) परमादेश (Mandamus - आलसी या मनमाने सरकारी अधिकारी को कानूनी कर्तव्य निभाने का आदेश), (3) प्रतिषेध (Prohibition - निचली अदालत को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकना), (4) उत्प्रेषण (Certiorari - गैरकानूनी प्रशासनिक या न्यायिक आदेश को रद्द करना), और (5) अधिकार पृच्छा (Quo Warranto - अवैध रूप से सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति को हटाना)।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी अनुच्छेद के तहत जनहित याचिका (PIL), पत्र याचिका (पोस्टकार्ड या पत्र को रिट मानना) और अवैध हिरासत या पुलिस प्रताड़ना के शिकार नागरिकों को सरकारी खजाने से मुआवजा (Constitutional Compensation) दिलाने की ऐतिहासिक व्यवस्था खड़ी की है।
अनुच्छेद 32A
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
अनुच्छेद 32A (राज्य विधियों की सांविधानिक वैधता पर अनुच्छेद 32 के अधीन विचार न किया जाना (निरसित)) संविधान के Part III में शामिल था, किंतु संसद ने संविधान (Forty-third Amendment (1977)) अधिनियम द्वारा इसे निरसित (Omitted/Repealed) कर दिया है। संवैधानिक क्रम और ऐतिहासिक संदर्भ बनाए रखने के लिए मूल संहिता में इसका क्रमांक सुरक्षित रखा गया है।
अनुच्छेद 33
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 33 'इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का सशस्त्र बलों आदि को लागू होने में उपांतरण करने की संसद की शक्ति' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 34
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 34 'जब किसी क्षेत्र में सेना विधि (मार्शल लॉ) प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर निर्बंधन' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 35
मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III
संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 35 'इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।
संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 36 'परिभाषा (नीति निर्देशक तत्वों के लिए "राज्य" की परिभाषा)' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।
संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 37 'इस भाग में अंतर्विष्ट तत्वों का लागू होना' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।
अनुच्छेद 38 संविधान के भाग IV (नीति निर्देशक तत्व) की आत्मा है। यह भारत को औपनिवेशिक 'पुलिस राज्य' से बदलकर एक 'लोक-कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) बनाता है। अनुच्छेद 38(1) राज्य को आदेश देता है कि वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाए जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे। 44वें संशोधन (1978) द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 38(2) सरकार को अमीरी-गरीबी की खाई पाटने तथा अलग-अलग क्षेत्रों व व्यवसायों के लोगों के बीच आय, प्रतिष्ठा और सुविधाओं की असमानता खत्म करने का निर्देश देता है।
अनुच्छेद 39 में 6 क्रांतिकारी आर्थिक और सामाजिक सिद्धांत (खंड क से च) दिए गए हैं जो हमारे कामकाजी जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं:
• अनुच्छेद 39(a): पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो।
• अनुच्छेद 39(b) व (c): देश के भौतिक संसाधनों का वितरण सामूहिक हित में हो और अर्थव्यवस्था में धन कुछ ही अमीरों के हाथों में केंद्रित न हो।
• अनुच्छेद 39(d) — समान कार्य के लिए समान वेतन: पुरुषों और स्त्रियों दोनों को समान काम के लिए बराबर वेतन मिले (समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976)।
• अनुच्छेद 39(e) व (f): श्रमिकों के स्वास्थ्य का शोषण न हो, आर्थिक मजबूरी में किसी को अपनी उम्र या ताकत से बाहर के काम में न धकेला जाए, और बच्चों को स्वतंत्र व गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर मिलें।
अनुच्छेद 39A (42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) सुनिश्चित करता है कि न्याय केवल अमीरों की जागीर न बने। यह राज्य को आदेश देता है कि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय पाने के अवसर से वंचित न किया जाए।
इसी अनुच्छेद के तहत संसद ने 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987' बनाया, जिससे राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), प्रत्येक जिले में DLSA और लोक अदालतों की स्थापना हुई। सभी महिलाओं (आय चाहे जितनी भी हो), बच्चों, अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST), दिव्यांगजनों, हिरासत में बंद विचाराधीन कैदियों और कम आय वाले नागरिकों को मुकदमा लड़ने के लिए 100% मुफ्त सरकारी वकील और कोर्ट फीस से छूट मिलती है।
महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के सपने को साकार करने के लिए अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया था। 1992 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा इसे भाग IX (अनुच्छेद 243–243O) के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया गया, जिससे ग्राम सभा, त्रि-स्तरीय पंचायती राज और महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (कई राज्यों में 50%) आरक्षण अनिवार्य हुआ।
अनुच्छेद 41 भारत के सामाजिक सुरक्षा तंत्र की जननी है। यह राज्य को निर्देश देता है कि वह अपनी आर्थिक क्षमता के भीतर काम पाने, शिक्षा पाने और बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी व दिव्यांगता की दशा में सरकारी सहायता दिलाने का प्रभावी प्रबंध करे। मनरेगा (MGNREGA 2005 — 100 दिन के रोजगार की गारंटी), दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act 2016), वृद्धावस्था पेंशन और विधवा पेंशन योजनाएं इसी अनुच्छेद की देन हैं।
अनुच्छेद 42 भारत की कामकाजी महिलाओं और माताओं का संवैधानिक सुरक्षा कवच है। यह राज्य को कार्यस्थल पर मानवीय परिस्थितियां बनाने और 'प्रसूति सहायता' (Maternity Relief) सुनिश्चित करने का आदेश देता है। इसी अनुच्छेद के तहत 'मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961' (2017 के संशोधन द्वारा 26 सप्ताह का पूर्ण सवैतनिक मातृत्व अवकाश) बनाया गया। 'दिल्ली नगर निगम बनाम महिला श्रमिक (2000)' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया कि केवल स्थायी ही नहीं, बल्कि दिहाड़ी (Daily-wage), अस्थायी और संविदा पर काम करने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश का पूरा अधिकार है।
अनुच्छेद 43 भारतीय श्रमिकों के अधिकारों का घोषणापत्र है। यह राज्य को निर्देश देता है कि वह खेतीहर, कारखाना या असंगठित क्षेत्र के सभी मजदूरों को काम, 'निर्वाह मजदूरी' (Living Wage), सम्मानजनक जीवन स्तर और उचित अवकाश (छुट्टी) सुनिश्चित करे। 'निर्वाह मजदूरी' का अर्थ केवल पेट भरना नहीं है, बल्कि इसमें परिवार की शिक्षा, इलाज, आवास और भविष्य की सुरक्षा (जैसे न्यूनतम मजदूरी कानून, EPF, ESIC) भी शामिल है।
संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 43A 'उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।
अनुच्छेद 44 राज्य नीति का एक निर्देशक सिद्धांत है। यह राज्य को सलाह देता है कि वह देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) बनाने का प्रयास करे। जहां आपराधिक व वाणिज्यिक कानून सभी के लिए समान हैं, वहीं शादी, तलाक और संपत्ति उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग धर्मों के लिए अलग रहे हैं। अनुच्छेद 44 लैंगिक न्याय और समानता की परिकल्पना करता है।
संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 45 'छह वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा का उपबंध' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।
संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 46 'अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।
अनुच्छेद 47 स्पष्ट शब्दों में घोषणा करता है कि जनता के पोषाहार स्तर (Nutrition) और जीवन स्तर को ऊंचा करना तथा लोक स्वास्थ्य (Public Health) का सुधार करना राज्य के 'प्राथमिक कर्तव्यों' में से एक है। साथ ही, यह औषधीय प्रयोजनों से भिन्न स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और नशीले पदार्थों (Drugs) के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश देता है। मिड-डे मील, आंगनवाड़ी पोषण अभियान, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज और खाद्य सुरक्षा कानून (FSSAI) इसी अनुच्छेद की देन हैं।
संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 48 'कृषि और पशुपालन का संगठन' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।
42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 48A, अनुच्छेद 51A(g) (नागरिक कर्तव्य) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के साथ मिलकर भारत का 'हरित संविधान' बनाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों अनुच्छेदों को मिलाकर 'प्रदूषण फैलाने वाला हर्जाना भरेगा' (Polluter Pays Principle) का नियम बनाया और 2024 में 'जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दुष्प्रभावों से मुक्त रहने के अधिकार' को मौलिक अधिकार घोषित किया।
संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 49 'राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।
अंग्रेजों के शासनकाल में जिले का कलेक्टर/डीएम ही पुलिस व लगान वसूली का मुखिया भी होता था और फौजदारी मुकदमों का जज भी—अर्थात पकड़ने वाला और फैसला सुनाने वाला एक ही व्यक्ति था! अनुच्छेद 50 ने इस अन्याय को समाप्त करने के लिए कार्यपालिका (पुलिस/प्रशासन) से न्यायपालिका (जजों) को अलग करने का आदेश दिया।
इसी अनुच्छेद के तहत दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (और अब BNSS, 2023) में जमानत, रिमांड और मुकदमे की सुनवाई की सारी शक्तियां प्रशासन से छीनकर स्वतंत्र 'न्यायिक मजिस्ट्रेटों' (Judicial Magistrates) को दी गईं, जो सरकार के नहीं बल्कि सीधे हाईकोर्ट के अधीन काम करते हैं।