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🇮🇳 भारत का सर्वोच्च विधान • 26 जनवरी 1950 को लागू

भारत का संपूर्ण संविधान: डिजिटल नागरिक महाग्रंथ

विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधान के 395 अनुच्छेदों, 25 भागों और 12 अनुसूचियों का अध्ययन करें सरल नागरिक भाषा, संविधान सभा के ऐतिहासिक विमर्श और सर्वोच्च अदालत के फैसलों के साथ।

395+
अनुच्छेद (Articles)
25
भाग (Thematic Parts)
12
अनुसूचियां (Schedules)
106
संशोधन (Amendments)
📜 उद्देशिका “हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए...”
“हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ईस्वी को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
Page 1 • सरल नागरिक भाषा में
अनुच्छेद 12 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

परिभाषा ("राज्य" शब्द का अर्थ)

मौलिक अधिकार हमें सरकार के मनमानेपन से बचाते हैं। अनुच्छेद 12 बताता है कि "राज्य" में कौन-कौन शामिल हैं: केंद्र सरकार, संसद, राज्य सरकारें, पुलिस, नगर पालिकाएं, पंचायतें और सरकारी उपक्रम।

अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियां (न्यायिक पुनर्विलोकन)

अनुच्छेद 13 न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति देता है। संसद या सरकार ऐसा कोई कानून या नियम नहीं बना सकती जो आपके मूल अधिकारों को छीने। यदि ऐसा हुआ तो कोर्ट उसे तुरंत रद्द कर देगी।

अनुच्छेद 14 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण

अनुच्छेद 14 भारत में 'कानून के शासन' (Rule of Law) की आधारशिला है और संविधान के 'स्वर्णिम त्रिभुज' (अनुच्छेद 14, 19 और 21) का पहला स्तंभ है। यह दो महान सिद्धांतों को जोड़ता है: (1) 'विधि के समक्ष समता'—जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति (चाहे वह कितना भी अमीर या प्रभावशाली हो) कानून से ऊपर नहीं है; और (2) 'विधियों का समान संरक्षण'—जिसका अर्थ है कि समान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के साथ कानून समान व्यवहार करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 'ई.पी. रोयप्पा (1974)' मामले में ऐतिहासिक सिद्धांत दिया कि 'समानता और मनमानापन एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं।' यदि कोई पुलिस अधिकारी, सरकारी विभाग या नगर निगम बिना किसी ठोस व तार्किक कारण के पक्षपातपूर्ण या मनमाना आदेश पारित करता है, तो वह सीधे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और अदालत उसे तुरंत रद्द कर सकती है।

अनुच्छेद 15 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध

अनुच्छेद 15 समाज में व्याप्त भेदभाव को जड़ से मिटाने का संवैधानिक कवच है। अनुच्छेद 15(1) राज्य को धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक से भेदभाव करने से रोकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 15(2) निजी मालिकों पर भी लागू होता है: कोई भी दुकानदार, होटल, रेस्तरां, मॉल या सिनेमा हॉल का मालिक आपको आपकी जाति, धर्म या लिंग के आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकता, और न ही सार्वजनिक कुओं, तालाबों, घाटों या सड़कों के उपयोग से रोक सकता है। इसके साथ ही, अनुच्छेद 15(3) से 15(6) 'सकारात्मक समानता' सुनिश्चित करते हैं। ये सरकार को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कानून व योजनाएं बनाने तथा सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने की शक्ति प्रदान करते हैं।

अनुच्छेद 16 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

लोक नियोजन (सरकारी नौकरी) के विषय में अवसर की समता

अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में बराबरी और निष्पक्षता की आधारशिला है। यह मनमाने भेदभाव पर रोक लगाते हुए राज्य को पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षण व विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति देता है।

अनुच्छेद 17 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

अस्पृश्यता (छुआछूत) का अंत

अनुच्छेद 17 एक पूर्ण मौलिक अधिकार है। यह छुआछूत की कुप्रथा को जड़ से समाप्त करता है। किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान, मंदिर, कुएं, भोजनालय या अस्पताल में जाति के आधार पर प्रवेश से रोकना गंभीर संज्ञेय अपराध है।

अनुच्छेद 18 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

उपाधियों का अंत

अंग्रेजी शासन में 'राय बहादुर', 'खान बहादुर' और 'सर' जैसी उपाधियां देकर समाज में कृत्रिम ऊंच-नीच पैदा की जाती थी। अनुच्छेद 18 इस सामंती व्यवस्था को समाप्त करता है। अनुच्छेद 18(1) के अनुसार राज्य सेना या विद्या (जैसे परमवीर चक्र, पीएचडी, डॉक्टर) संबंधी सम्मान के सिवाय कोई और उपाधि नहीं देगा। 'बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996)' में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत रत्न और पद्म पुरस्कार अनुच्छेद 18 के तहत 'उपाधि' नहीं हैं, बल्कि उत्कृष्ट योगदान का सम्मान हैं—बशर्ते पुरस्कार विजेता इनका प्रयोग अपने नाम के आगे या पीछे (Prefix/Suffix) उपाधि की तरह न करें।

अनुच्छेद 19 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

वाक्-स्वतंत्रता आदि छह मूल स्वतंत्रताओं का संरक्षण

अनुच्छेद 19 भारतीय लोकतंत्र की प्राणवायु है। यह अनुच्छेद 19(1) के तहत प्रत्येक भारतीय नागरिक को 6 बुनियादी स्वतंत्रताएं प्रदान करता है: • अनुच्छेद 19(1)(a) — वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इसमें बोलने, लिखने, प्रेस की आजादी, सरकारी नीतियों की आलोचना करने, सूचना का अधिकार (RTI), इंटरनेट के माध्यम से विचार रखने और अपने घर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार शामिल है। • अनुच्छेद 19(1)(b) — शांतिपूर्वक और निरायुध (बिना हथियार) सम्मेलन का अधिकार: शांतिपूर्ण धरना, जुलूस और जनसभा करने का अधिकार। • अनुच्छेद 19(1)(c) — संगम, संघ या सहकारी समिति बनाने का अधिकार: राजनीतिक दल, मजदूर यूनियन, एनजीओ या सोसाइटी बनाने की आजादी। • अनुच्छेद 19(1)(d) — भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का अधिकार: देश के किसी भी राज्य या शहर में बिना रोक-टोक आने-जाने की स्वतंत्रता। • अनुच्छेद 19(1)(e) — भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बस जाने का अधिकार: किसी भी राज्य में किराये पर रहने या बसने का हक। • अनुच्छेद 19(1)(g) — कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार: रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर स्टार्टअप और पेशेवरों तक को अपनी आजीविका कमाने की आजादी।

अनुच्छेद 20 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण

अनुच्छेद 20 पुलिस की मनमानी और दमनकारी आपराधिक कानूनों के विरुद्ध नागरिकों का अभेद्य कवच है। अनुच्छेद 21 के साथ यह इतना पवित्र है कि 44वें संविधान संशोधन के तहत राष्ट्रीय आपातकाल में भी इसे कभी निलंबित नहीं किया जा सकता। इसके तीन अटल स्तंभ हैं: 1. अनुच्छेद 20(1) — भूतलक्षी दांडिक विधियों से संरक्षण (Ex-Post Facto Law): यदि कोई कार्य करते समय वह कानूनन अपराध नहीं था, तो बाद में नया कानून बनाकर आपको उस पुराने कार्य के लिए सजा नहीं दी जा सकती, और न ही उस समय तय सजा से अधिक सजा दी जा सकती है। 2. अनुच्छेद 20(2) — दोहरे दंड से सुरक्षा (Double Jeopardy): किसी भी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए अदालत में एक से अधिक बार मुकदमा चलाकर दंडित नहीं किया जा सकता। 3. अनुच्छेद 20(3) — आत्म-अभिशंसन से संरक्षण (Right against Self-Incrimination): किसी भी अभियुक्त को खुद के खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसीलिए थाने में पुलिस के डर या मारपीट से लिया गया बयान या सादे कागज पर हस्ताक्षर कोर्ट में शून्य (अमान्य) होता है।

अनुच्छेद 21 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (जीवन, गरिमा व निजता का अधिकार)

अनुच्छेद 21 केवल एक वाक्य का है—'किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं'—लेकिन यह भारतीय संविधान का सबसे विशाल व जीवंत मानवाधिकार स्तंभ है। यह 'व्यक्ति' शब्द का प्रयोग करता है, इसलिए यह भारतीय नागरिकों और विदेशियों दोनों की रक्षा करता है। 1978 के ऐतिहासिक 'मेनका गांधी बनाम भारत संघ' फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 14, 19 और 21 को जोड़कर 'स्वर्णिम त्रिभुज' (Golden Triangle) की स्थापना की। कोर्ट ने घोषित किया कि 'जीवन' का अर्थ केवल सांस लेना या पशुवत जीवित रहना नहीं है, बल्कि 'मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार' है। साथ ही, जिस कानून से स्वतंत्रता सीमित की जाए, वह कानून स्वयं 'न्यायसंगत, निष्पक्ष और तार्किक' (Just, Fair and Reasonable) होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के भीतर 35 से अधिक मौलिक अधिकारों को समाहित किया है—जिनमें निजता का अधिकार (पुट्टास्वामी, 2017), सड़क दुर्घटना या आपातकाल में तुरंत इलाज का अधिकार (परमानंद कटारा, 1989), आजीविका और आश्रय का अधिकार (ओल्गा टेलिस, 1985), स्वच्छ हवा व पानी का अधिकार, त्वरित सुनवाई व मुफ्त कानूनी सहायता (हुसैनआरा खातून, 1979), अवैध हथकड़ी व हिरासत में प्रताड़ना से मुक्ति, और गरिमापूर्ण मृत्यु/लिविंग विल का अधिकार शामिल हैं।

अनुच्छेद 21A मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

शिक्षा का अधिकार (6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा)

प्रारंभ में शिक्षा का उल्लेख नीति निर्देशक तत्व (अनुच्छेद 45) में था, किंतु 'उन्नी कृष्णन (1993)' फैसले के बाद संसद ने 86वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 पारित कर अनुच्छेद 21A को मौलिक अधिकार बना दिया। इसे धरातल पर लागू करने के लिए 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009' लागू किया गया। इसमें 'निःशुल्क' का अर्थ है कि 6 से 14 वर्ष के किसी भी बच्चे से सरकारी स्कूल में ट्यूशन फीस, किताबों, यूनिफॉर्म या मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) के लिए कोई पैसा नहीं लिया जाएगा। 'अनिवार्य' शब्द सरकार पर यह कानूनी जिम्मेदारी डालता है कि हर बस्ती के 1 से 3 किलोमीटर के भीतर स्कूल हो, प्रशिक्षित शिक्षक हों, और सभी गैर-सहायता प्राप्त निजी (प्राइवेट) स्कूलों की शुरुआती कक्षा में 25% सीटें गरीब और वंचित वर्ग (EWS/DG) के बच्चों के लिए पूरी तरह मुफ्त आरक्षित हों।

अनुच्छेद 22 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (24 घंटे का मजिस्ट्रेट नियम)

अनुच्छेद 22 पुलिस थाने के भीतर आम नागरिक का सबसे बड़ा रक्षक है। यह सुनिश्चित करता है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को 'पूछताछ' के बहाने गुप्त रूप से उठाकर अवैध रूप से हवालात में बंद न रख सके। अनुच्छेद 22(1) और 22(2) प्रत्येक सामान्य गिरफ्तारी के लिए तीन अटल नियम तय करते हैं: 1. गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार (अनुच्छेद 22(1)): गिरफ्तार करते समय पुलिस के लिए यह बताना अनिवार्य है कि आपको किस अपराध और किस आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है (सुप्रीम कोर्ट के पंकज बंसल 2023 व प्रबीर पुरकायस्थ 2024 फैसलों के अनुसार लिखित में आधार देना अनिवार्य है)। 2. अपनी पसंद के वकील से परामर्श और बचाव का अधिकार (अनुच्छेद 22(1)): हिरासत में लिए जाने के पहले क्षण से ही आपको अपने वकील से बात करने का संवैधानिक हक है। 3. 24 घंटे का मजिस्ट्रेट नियम (अनुच्छेद 22(2)): गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर नजदीकी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे से एक मिनट भी अधिक थाने में रखना अवैध हिरासत (Illegal Detention) है। इसके अलावा, अनुच्छेद 22(4)–22(7) निवारक निरोध (Preventive Detention) पर भी सख्त अंकुश लगाते हैं: हाईकोर्ट के जजों के सलाहकार बोर्ड की मंजूरी के बिना किसी को 3 महीने से अधिक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता।

अनुच्छेद 23 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

मानव दुर्व्यापार और बलात्श्रम (बंधुआ मजदूरी) का प्रतिषेध

अनुच्छेद 23 बंधुआ मजदूरी, मानव तस्करी और श्रमिकों के शोषण से सुरक्षा प्रदान करता है। किसी को उसकी मर्जी के बिना काम करने पर मजबूर करना या न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना इस अनुच्छेद के तहत अवैध 'बलात श्रम' माना जाता है।

अनुच्छेद 24 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

कारखानों आदि में बालकों के नियोजन (बाल श्रम) का प्रतिषेध

अनुच्छेद 24 बाल अधिकारों की ढाल है। यह 14 साल से छोटे बच्चों को जोखिम भरे कामों, फैक्ट्रियों या खदानों में काम करने से रोकता है। अनुच्छेद 21A के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करता है कि हर बच्चे का स्थान स्कूल में है, काम पर नहीं।

अनुच्छेद 25 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 25 भारतीय पंथनिरपेक्षता (धर्मनिरपेक्षता) की आत्मा है। यह हर व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने और अपनी पसंद के धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। भारतीय राज्य किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता बल्कि सभी धर्मों का समान सम्मान करता है।

अनुच्छेद 26 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता

जहां अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों के सामूहिक अधिकारों की रक्षा करता है। लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या धर्मार्थ ट्रस्ट स्थापित करने, अपने धार्मिक अनुष्ठानों का प्रबंधन करने और कानून के अनुसार संपत्ति का प्रशासन करने का अधिकार है।

अनुच्छेद 27 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता

अनुच्छेद 27 भारतीय पंथनिरपेक्षता का वित्तीय स्तंभ है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी धर्मों के नागरिकों से वसूले गए सरकारी टैक्स के पैसे को किसी एक विशेष धर्म के प्रचार या रखरखाव के लिए समर्पित नहीं किया जा सकता। हालांकि, तीर्थयात्रियों की सुरक्षा, स्वच्छता और प्रबंधन के लिए लिया जाने वाला मामूली 'सेवा शुल्क' (Fee) टैक्स नहीं माना जाता।

अनुच्छेद 28 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता

अनुच्छेद 28 शिक्षा परिसरों को धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बनाए रखता है। अनुच्छेद 28(1) के अनुसार, पूर्णतः राज्य निधि से संचालित किसी भी सरकारी स्कूल/कॉलेज में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। अनुच्छेद 28(3) के अनुसार, राज्य से मान्यता प्राप्त या सहायता प्राप्त किसी भी स्कूल में किसी छात्र को उसकी (या नाबालिग होने पर उसके माता-पिता की) सहमति के बिना किसी धार्मिक उपासना या धार्मिक कक्षा में बैठने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 29 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों, भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण

अनुच्छेद 29 भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का रक्षक है। अनुच्छेद 29(1) के अनुसार, भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का पूर्ण मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 29(2) स्पष्ट करता है कि राज्य द्वारा पोषित या सरकारी सहायता पाने वाले किसी भी स्कूल/कॉलेज में किसी भी नागरिक को धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 30 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक-वर्गों का अधिकार

अनुच्छेद 30 धार्मिक अल्पसंख्यकों और भाषाई अल्पसंख्यकों (जैसे महाराष्ट्र में बांग्ला भाषी या दक्षिण भारत में हिंदी भाषी) के शैक्षणिक अधिकारों का सुरक्षा कवच है। अनुच्छेद 30(1) के तहत सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं (स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय) की स्थापना और प्रशासन का अधिकार है। अनुच्छेद 30(2) सरकार को अनुदान (Aid) देने में अल्पसंख्यक संस्थानों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव करने से रोकता है।

अनुच्छेद 31 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

संपत्ति का अनिवार्य अर्जन (44वें संशोधन द्वारा निरसित)

अनुच्छेद 31 (संपत्ति का अनिवार्य अर्जन (44वें संशोधन द्वारा निरसित)) संविधान के Part III में शामिल था, किंतु संसद ने संविधान (Forty-fourth Amendment (1978)) अधिनियम द्वारा इसे निरसित (Omitted/Repealed) कर दिया है। संवैधानिक क्रम और ऐतिहासिक संदर्भ बनाए रखने के लिए मूल संहिता में इसका क्रमांक सुरक्षित रखा गया है।

अनुच्छेद 31A मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 31A 'संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।

अनुच्छेद 31B मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण (नौवीं अनुसूची)

संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 31B 'कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण (नौवीं अनुसूची)' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।

अनुच्छेद 31C मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 31C 'कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।

अनुच्छेद 31D मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

राष्ट्रविरोधी क्रियाकलापों के संबंध में विधियों की व्यावृत्ति (निरसित)

अनुच्छेद 31D (राष्ट्रविरोधी क्रियाकलापों के संबंध में विधियों की व्यावृत्ति (निरसित)) संविधान के Part III में शामिल था, किंतु संसद ने संविधान (Forty-third Amendment (1977)) अधिनियम द्वारा इसे निरसित (Omitted/Repealed) कर दिया है। संवैधानिक क्रम और ऐतिहासिक संदर्भ बनाए रखने के लिए मूल संहिता में इसका क्रमांक सुरक्षित रखा गया है।

अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

संवैधानिक उपचारों का अधिकार — मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार

9 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को 'संविधान की आत्मा और उसका हृदय' घोषित किया था—क्योंकि यदि नागरिकों को अधिकार दिए जाएं पर उनके छिनने पर उन्हें तुरंत लागू कराने का कोई अचूक कानूनी रास्ता न हो, तो वे अधिकार केवल कागज के टुकड़े रह जाते हैं। अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 32(1) प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) जाने की गारंटी देता है। अनुच्छेद 32(2) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 5 ऐतिहासिक रिट जारी करने की असीम शक्ति प्राप्त है: (1) बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus - अवैध हिरासत से तत्काल रिहाई), (2) परमादेश (Mandamus - आलसी या मनमाने सरकारी अधिकारी को कानूनी कर्तव्य निभाने का आदेश), (3) प्रतिषेध (Prohibition - निचली अदालत को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकना), (4) उत्प्रेषण (Certiorari - गैरकानूनी प्रशासनिक या न्यायिक आदेश को रद्द करना), और (5) अधिकार पृच्छा (Quo Warranto - अवैध रूप से सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति को हटाना)। सुप्रीम कोर्ट ने इसी अनुच्छेद के तहत जनहित याचिका (PIL), पत्र याचिका (पोस्टकार्ड या पत्र को रिट मानना) और अवैध हिरासत या पुलिस प्रताड़ना के शिकार नागरिकों को सरकारी खजाने से मुआवजा (Constitutional Compensation) दिलाने की ऐतिहासिक व्यवस्था खड़ी की है।

अनुच्छेद 32A मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

राज्य विधियों की सांविधानिक वैधता पर अनुच्छेद 32 के अधीन विचार न किया जाना (निरसित)

अनुच्छेद 32A (राज्य विधियों की सांविधानिक वैधता पर अनुच्छेद 32 के अधीन विचार न किया जाना (निरसित)) संविधान के Part III में शामिल था, किंतु संसद ने संविधान (Forty-third Amendment (1977)) अधिनियम द्वारा इसे निरसित (Omitted/Repealed) कर दिया है। संवैधानिक क्रम और ऐतिहासिक संदर्भ बनाए रखने के लिए मूल संहिता में इसका क्रमांक सुरक्षित रखा गया है।

अनुच्छेद 33 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का सशस्त्र बलों आदि को लागू होने में उपांतरण करने की संसद की शक्ति

संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 33 'इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का सशस्त्र बलों आदि को लागू होने में उपांतरण करने की संसद की शक्ति' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।

अनुच्छेद 34 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

जब किसी क्षेत्र में सेना विधि (मार्शल लॉ) प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर निर्बंधन

संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 34 'जब किसी क्षेत्र में सेना विधि (मार्शल लॉ) प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर निर्बंधन' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।

अनुच्छेद 35 मौलिक अधिकार — नागरिक सुरक्षा कवच
Part III

इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान

संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) में अनुच्छेद 35 'इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान' का उपबंध करता है। यह मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन, भूमि सुधार व कल्याणकारी कानूनों के संरक्षण (31A-31C), सशस्त्र बलों में अनुशासन हेतु आवश्यक नियमों (33) तथा मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु संसद की विधायी शक्ति (35) को स्पष्ट करता है।

Part III (30 अनुच्छेदs)
सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) एवं वैधानिक प्रामाणिकता सूचना

भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम (Copyright Act), 1957 की धारा 52(1)(q) के अंतर्गत भारत का संविधान, संसदीय अधिनियम, राजपत्र अधिसूचनाएं तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के निर्णय सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) में हैं। यह पाठ विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार (India Code) के आधिकारिक अभिलेखों पर आधारित है।

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